इंदौर में 16 साल के मासूम गुलशन की ज़िंदगी उस चाइनीज़ मांझे ने छीन ली,
जिसे रोकने के लिए आदेश तो बहुत निकले…
पर अमल?
किस्मत की तरह कागज़ों में ही रह गया।
तेजाजी नगर बायपास पर गिरा हुआ वो खून सिर्फ एक बच्चे का नहीं,
पूरे सिस्टम की नींद पर लगा एक ज़ोरदार तमाचा है।
कहने को पुलिस और प्रशासन की मशीनरी अब जागी है—
छापे, जब्ती, चेतावनियाँ…
सब हो रहा है।
लेकिन सवाल अभी भी वहीं खड़ा है:
क्यों हमेशा किसी की मौत के बाद ही कानून सक्रिय होता है?

सराफा एसीपी हेमंत चौहान की टीम ने भारी मात्रा में चाइनीज़ मांझा पकड़ा,
पर ये दर्दनाक सच्चाई कौन छुपाएगा कि
इसी मांझे ने देवास से इंदौर तक
हर गली-मोहल्ले में खुलेआम बिकते हुए
कितनी जिंदगियों को जोखिम पर रख दिया है?
गुलशन के घर में आज भी उसके जूतों की मिट्टी ताज़ा है,
उस किताब के पन्ने खुले हैं,
जिसे पढ़कर वह कल कुछ बड़ा बनना चाहता था।
पर एक पतंग के धागे ने सब सपनों का गला घोंट दिया।
प्रदेश में हर साल तीज-त्योहारों पर
आसमान रंगीन होता है…
मगर कोई बताओ—
ये रंग किस कीमत पर?
एक बच्चे की जान से ज़्यादा क्या किसी मांझे का मुनाफ़ा बड़ा है?
कलेक्टरों के आदेश हों या पुलिस के दावे—
अगर ज़मीन पर अमल नहीं,
तो ये कागज़ सिर्फ फाइलें मोटी करते हैं,
माताओं की मांग नहीं।
समय है कि प्रशासन सिर्फ जब्ती न करे,
बल्कि इस मौत के दर्द को महसूस करके
सख़्त से सख़्त कदम उठाए।
निगरानी हो, कड़ाई हो,
क्योंकि बच्चे आसमान में सपने उड़ाते हैं…
मौत नहीं।
गुलशन की मौत आँकड़ा नहीं,
एक चेतावनी है—
अगर अब भी नहीं संभले,
तो ये चाइनीज़ धागे
किस-किस के घर का सूरज बुझा देंगे,
कहना मुश्किल है।

