दिलीप मिश्रा…
देवास जिले में झोलाछाप डॉक्टर की गिरफ्तारी कोई असाधारण घटना नहीं… बल्कि एक बार फिर सामने आई उस सच्चाई का प्रमाण है… जिसे सिस्टम लंबे समय से नजरअंदाज करता आ रहा है…। हरणगांव थाना क्षेत्र में झोलाछाप के इलाज से 16 साल की मासूम को इंफेक्शन होना… झोलाछाप के ख़िलाफ़ हरणगांव थाने में मुकदमा दर्ज होना… और महेंद्र सेंगर नामक झोलाछाप का जेल जाना…। पहला मामला नहीं है… और दुर्भाग्यवश आखिरी भी नहीं होगा…! यदि अब भी जिम्मेदार विभागों की आंखें नहीं खुलीं…. तो…।

जिलेभर में जगह-जगह बिना डिग्री… बिना पंजीयन और बिना किसी जवाबदेही के झोलाछाप क्लिनिक खुलेआम संचालित हो रहे हैं…। यह मान लेना भोलेपन की हद तक गलत होगा कि… स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं है… जानकारी है…, पूरी है… फिर भी सवाल यह है कि… जब सब कुछ मालूम है…, तो कार्रवाई क्यों नहीं होती…?
जवाब भी उतना ही कड़वा है…,थोड़े से ‘सुविधा शुल्क’ और निजी लाभ के बदले नियमों को ताक पर रख दिया जाता है…।
जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता…, तब तक सब कुछ “सामान्य” चलता रहता है…। और जैसे ही किसी मासूम की जान पर बन आती है…, विभागीय अफसर हरकत में आते हैं…,आदेश निकलते हैं…, निरीक्षण होते हैं…, नोटिस चिपकाए जाते हैं… और कुछ दिनों बाद वही झोलाछाप फिर से बेखौफ इलाज करने लगते हैं…। यह कार्रवाई नहीं…, केवल दिखावा है…।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन झोलाछापों के जाल में सबसे ज्यादा फंसता है गरीब और मजदूर वर्ग…। महंगे निजी अस्पतालों का खर्च वहन न कर पाने वाला आम नागरिक पास के “डॉक्टर साहब” पर भरोसा करता है…। उसे नहीं पता होता कि सस्ती फीस के पीछे उसकी जिंदगी दांव पर लगी है…। नतीजा… साधारण चोट जानलेवा संक्रमण में बदल जाती है… और इलाज के बजाय त्रासदी जन्म ले लेती है…।
यह प्रश्न अब केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रह गया है…, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है…। जब विभागीय स्तर पर वर्षों से आंख मूंदकर बैठने की परंपरा बन चुकी है…, तब अब समय आ गया है कि कलेक्टर स्वयं इस पूरे तंत्र की कमान संभालें…।
जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग के भरोसे कार्रवाई छोड़ने के बजाय प्रशासन…, पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम गठित की जाए…। नियमित, आकस्मिक और निष्पक्ष निरीक्षण हों…। क्लिनिक केवल सील न हों, बल्कि दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो…, ताकि डर पैदा हो…, सिर्फ कागजों में नहीं…, जमीन पर…।
झोलाछाप डॉक्टर सिर्फ कानून नहीं तोड़ रहे…, वे सीधे-सीधे लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं…। ऐसे में चुप्पी भी अपराध के बराबर है…। अब यह तय करना प्रशासन के हाथ में है कि वह इस मुद्दे को एक और फाइल बनाकर दबा देता है… या वास्तव में उन गरीबों की जिंदगी बचाने के लिए सख्त और स्थायी कदम उठाता है…।
क्योंकि हर अगली घटना से पहले यही सवाल उठेगा…, अगर सबको पता था, तो रोका क्यों नहीं गया…?
