दिलीप मिश्रा
देवास। आयुष्मान भारत योजना के तहत एक मरीज से 15 हजार रुपये लेने और बाद में शिकायत पर वह राशि वापस कराने का मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

जिला शिकायत निवारण समिति के माध्यम से मरीज के परिजन को राशि लौटाई गई, लेकिन पूरे घटनाक्रम में संबंधित निजी अस्पताल का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया। यही सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
मामला क्या है?
देवास निवासी एक मरीज आयुष्मान कार्ड के साथ निजी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे। आरोप है कि अस्पताल ने आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद ऑपरेशन के नाम पर 15 हजार रुपये जमा कराए।
परिजन द्वारा शिकायत करने पर जांच हुई और राशि वापस कराई गई। अस्पताल ने चेक सीएमएचओ कार्यालय को सौंपा, जिसे बाद में पीड़ित परिवार को दिया गया।
उठ रहे बड़े सवाल
1. अस्पताल का नाम सार्वजनिक क्यों नहीं? यदि वसूली गलत थी, तो अस्पताल की पहचान क्यों छिपाई गई?
2. क्या केवल राशि लौटाना पर्याप्त कार्रवाई है?क्या यह आर्थिक अनियमितता नहीं मानी जाएगी?
3. क्या आयुष्मान योजना के नियमों का उल्लंघन हुआ? यदि हाँ, तो अस्पताल पर पैनल से हटाने या जुर्माने की कार्रवाई क्यों नहीं बताई गई?
4. सीएमएचओ की भूमिका पर सवाल । क्या केवल पैसा वापस करवा देने से मामला समाप्त माना जा सकता है? क्या दोषी अस्पताल के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की गई?
5. फोटो से क्या संदेश? राशि वापसी के दौरान अधिकारियों की मौजूदगी में फोटो जारी किए गए—क्या यह प्रशासनिक उपलब्धि है या व्यवस्था की चूक?
नियम क्या कहते हैं?
आयुष्मान भारत योजना के तहत पैनल अस्पताल आयुष्मान कार्डधारी मरीज से सूचीबद्ध उपचार के लिए अलग से राशि नहीं ले सकते। यदि ऐसा पाया जाता है तो संबंधित अस्पताल पर आर्थिक दंड, ब्लैकलिस्टिंग या पैनल से हटाने तक की कार्रवाई संभव है।
प्रशासनिक पारदर्शिता की जरूरत
मामले में राशि वापसी सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन जनहित का बड़ा प्रश्न यह है कि—
• क्या दोषी अस्पताल के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई?
• क्या भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई जाएगी?
• क्या जिले में अन्य आयुष्मान मरीजों से भी इसी तरह वसूली हुई है?
जनहित का मुद्दा
आयुष्मान योजना गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए जीवनरेखा है। यदि पैनल अस्पताल ही योजना की शर्तों का उल्लंघन करें और कार्रवाई सिर्फ राशि वापसी तक सीमित रहे, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अब निगाह इस बात पर है कि स्वास्थ्य विभाग पारदर्शिता दिखाते हुए संबंधित अस्पताल का नाम सार्वजनिक करता है या नहीं, और क्या ठोस दंडात्मक कार्रवाई सामने आती है।

